मैं जो करता हूँ वे सामाजिक मान्यताओं के आधार होते हैं ,
जो मैं सोचता हूँ वे मेरे उन्मुक्त विचार होते हैं |
सामाजिक आधारों से बेशक सफल इंसान बनते हैं ,
पर उन्मुक्त विचारों से नए समाज पनपते हैं|
छाते का साया तुम्हें सिर्फ भीगने से बचाएगा , पर ,
बाढ़ का पानी सर से नहीं पैरों से डुबायेगा |
शीर्ष पर तो फिर पहुंचा जा सकता है , पर '
उखड़े पाओं वापस जमाना महंगा पड़ सकता है |
पर सभी तो शीर्ष की और ही भाग रहे हैं ,
अपने पाओं ज़मीन से उखाड़ रहे हैं |
फिर क्यूँ मैं सामजिक मान्यताओं को आधार मानू ,
क्यों ना उन्मुक्त विचारों से एक नया समाज सुधारून |
Sunday, February 7, 2010
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