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Sunday, February 7, 2010

मैं जो करता हूँ वे सामाजिक मान्यताओं के आधार होते हैं ,
जो मैं सोचता हूँ वे मेरे उन्मुक्त विचार होते हैं |

सामाजिक आधारों से बेशक सफल इंसान बनते हैं ,
पर उन्मुक्त विचारों से नए समाज पनपते हैं|

छाते का साया तुम्हें सिर्फ भीगने से बचाएगा , पर ,
बाढ़ का पानी सर से नहीं पैरों से डुबायेगा |

शीर्ष पर तो फिर पहुंचा जा सकता है , पर '
उखड़े पाओं वापस जमाना महंगा पड़ सकता है |

पर सभी तो शीर्ष की और ही भाग रहे हैं ,
अपने पाओं ज़मीन से उखाड़ रहे हैं |

फिर क्यूँ मैं सामजिक मान्यताओं को आधार मानू ,
क्यों ना उन्मुक्त विचारों से एक नया समाज सुधारून |

4 comments:

  1. impressd!!!!society is wat we make...nt wat it make us...alwys wid u in da notion...

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  2. thank u very much , if we say ye sab philosophical hai kitaabon main achcha lagta hai to bhai kitab padhna band karo aur uske arth ko samajhne ki koshish karo

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  3. i cant believ dis is writen by u............mindblowing........

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